केदारनाथ सिंह के काव्य में सामाजिक-संवेदना
प्रज्ञा त्रिवेदी1] आभा तिवारी2
1शोधार्थी, दूधाधारी बजरंग महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर
2प्राध्यापक, दूधाधारी बजरंग महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर
प्रस्तावना
समकालीन कविता में एक विशिश्ट प्रकार की कलात्मकता पाई जाती है। रुप, शिल्प का यह प्रवेश कविता के सुखद अनुभव हैं और अपने अनुभवों को सुखद कलात्मकता के साथ चित्रित करने के कारण उसकी शक्ति और सामथ्र्य में अभूतपूर्व वृद्धि भी हुई है। मानव-जीवन का यथार्थ प्रभाव सम्पन्नता के साथ हमारे सम्मुख हो रहा है । समकालीन कविता में जीवन का यथार्थ- अनुभव ही अभिव्यक्ति नहीं होता वरन् प्रतीकात्मक रुप से भी वह सामने आता है। कविता अपनी एक खास तकनीक और शिल्प के कारण समकालीन कविता में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाती है । केदार जी अत्यधिक संवेदनशील कवि हैं उनकी कविताओं से उनका दर्शन परिलक्षित होता है। कवि इतना अधिक संवेदनशील है कि ढे़ले के अंदर की सूक्ष्म आवाज, कीड़े-मकोड़ों की हल्की सी सरसराहट से उसे प्रतीत होता है कि कीड़े-मकोड़े किसी गुप्त प्रिंटर से रात भर खबरें छापते हैं मगर उन खबरों का कोई अखबार नहीं छपता -
‘‘कभी रात के तीसरे पहर
जागकर तो देखो
कभी सुनो तो किसी ढे़ले पर कान लगाकर
किस तरह कीड़ो-मकोड़ों के गुप्त टेलीप्रिंटर पर
रात भर छपती रहती हैं
वे सारी खबरें
जिन्हें दुनियाॅ का कोई अखबार
नहीं छापता’’1
समकालीन कवियों में केदार जी अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में हद्वय एवं मस्तिश्क का पूर्ण सहयोग माना जा सकता है जैसा कि जयशंकर प्रसाद ने हद्वय और बुद्धि दोनों का सामंजस्य ही मनुश्य के लिए उचित बताया है जबकि आज कवि या साहित्यकार समाज में मूल्यों का अन्वेशण करने का प्रयत्न करता है किन्तु उसका सर्वप्रथम ध्यान इस बात में लगा रहता है कि उसकी व्यक्तिगत स्थिति कहाॅ पर है? वस्तुतः कह सकते हैं कि नये मूल्यों का समाज में निर्माण न होना भी सामाजिक स्थिति में असहयोग प्रदान कर रहा है किन्तु अभी ऐसी स्थिति भारतवर्श में नहीं है कि अराजकता का माहैाल हो जैसा कि अन्य देशों में हो रहा है।
केदार की कविताओं में कहीं-कहीं नाटकीय तत्वों एवं स्थितियों का प्रक्षेपण हुआ है। इनकी कविताओं को समझने के लिए पाठक में धैर्य की आवश्यकता होनी चाहिए क्योंकि अधिकांश कवितायें इतनी गंभीर हैं कि जब उन्हें कई बार पढ़ो तो अचानक उसका अर्थ कौंध जाता है।
समकालीन यथार्थ का, उसके भीशण अनुभव का, विश्लेशण करने से केदार संतुश्ट प्रतीत नहीं होते साथ ही साथ अपने आसपास का वातावरण भी उन्हें असंतुश्ट करता है । केदार की एक विशेशता है कि काव्य-रचना के अंत तक आते-आते पाठक से ही प्रश्न पूछते हैं और ऐसा करके वे पाठक के प्रति अपने विश्वास को प्रकट कर देते हैं। जहाॅ समकालीन अधिकांश कवियों में अहं की भावना सर्वाधिक है जैसे कि ‘मैं सब कुछ जानता हॅू, मुझे-सब-पर-सब-कुछ- कह-लेने-का-हक है’ ऐसी स्थितियों से बचते हुए शालीनता के साथ समस्याओं को पाठक के समक्ष प्रस्तुत कर उसे हल करनेे हेतु उसे उपदेश नहीं करते हैं वरन् ‘ऐसा होता तो’, या ‘मैं ऐसा कर पाता ’, या ‘अब आप ही बतायें’, आदि बातेां पर ज्यादा ध्यान देते हैं ।
आधुनिक युग में मनुश्य सारी सुख-सुविधाओं के बावजूद अकेला हो गया है तो इस अकेलेपन केा सिंह जी भी महसूस करते हैं और उनकी कविता से बार-बार यह बात प्रकट होती है। ‘‘कविता मानवीय-मूल्यों का पक्ष है और किसी भी तरह के अमानवीयकरण के खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया’’2। ‘‘ आधुनिक बाजार और प्रचारतंत्र ने वाचिक-परंपरा की कविता केा अश्लीलता की हद तक बाजारू बना दिया है,पर इसलिए ही उसे उसके जीवंत-रूप रचने -गढ़ने का महत्व है और जोखिम कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक लगता है’’3।
अधिकांश समकालीन कविता ने अपने उत्कृश्टतम रूप में भी ‘प्रकृति’ केा अपनी नागरिक समस्याओं से जुड़े एक काव्य-विशय के रूप में लिया है। आधुनिक युग के विकसित चरण में प्रकृति की सत्ता केा इतने सीमित क्षुद्र रूप में देखने की कोशिश के समाजशास्त्रीय कारणों की तफसील में गये बगैर भी यह निशंक कहा जा सकता है कि ‘‘कविता के अपने तौर-तरीकेां से ज्यादा महत्वपूर्ण कविता की सिकुड़न की नई परिस्थिति केा मानने के पीछे एक तरह का घुटनाटेक दृश्टिकोण था, जिसने एक तरफ तो साम्य और स्वतंत्रता के पश्यंति मूल्यों को बतौर नुस्खे के ग्रहण किया और दूसरी ओर यह माना कि प्रकृति की हमारी अपनी कविता के संस्कार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा नया विचार है’’4।
यह कहना उपयुक्त होगा कि समकालीन काव्य में केदार की कवितायें प्रकृति के साथ एक जीवंत संपर्क को उजागर करने वाली हैं । सिंह जी अपनी कविताओं में भौतिक-जगत की किसी वस्तु केा उठाते हुए उसे अपने अंदर डूबकर मन की जटिल गहराइयों को खोजते हैं किंतु आत्मनिश्ठता का स्पर्श करते -करते पुनः उसी वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करते हैं,जहाॅ से उसे प्रारम्भ किया था । प्रत्येक युग का काव्य समाज के मूल्यों पर निर्भर करता है साथ ही साथ काव्य पर सामाजिक परिवेश का भी फर्क पड़ता है क्योंकि समाज के मूल्यों से ही काव्य के संस्कार निर्धारित होते हैं। मनुश्य की चेतना जहाॅ एक ओर नये मूल्यों का अन्वेशण करती है वहीं दूसरी ओर तत्कालीन सामाजिक चिंतन भी ग्रहण करती है । देखा जाये तो मनुश्य की अंतः प्रवृत्तियाॅ ही जीवन को निर्धारित करती हैं अतः जब तक मनुश्य की अंतःप्रवृत्तियों का विकास नहीं होगा तब तक मनुश्य की संवेदना का विकास भी नहीं हो पायेगा। केदारनाथ सिंह के अनुसार, ‘‘समाज के प्रत्येक सदस्य की छोटी से छोटी चेतन-क्रिया किसी न किसी अश्ंा में सामाजिक होती है। फिर कविता तो समाज के सबसे अधिक संवेदनशील व्यक्ति की चेतन-क्रिया है। उसकी सामाजिकता असंदिग्ध है। कविता अपने अनावृत रूप में केवल एक विचार, एक भावना, एक अनुभूति, एक दृश्य इन सब का कलात्मक संगठन अथवा इन सब के अभाव की तीखी पकड़ होती है। यह पकड़ जितनी ही वास्तविक होगी, कवि का संवेद्य उतना ही गहरा और प्रभावशाली होगा’’5।
केदार समकालीन समय में बढ़ रही स्वार्थपरता एवं प्रत्येक व्यक्ति की चुप्पी से व्यथित हैं क्योंकि आज के समय में हर व्यक्ति अपने आप में व्यस्त है और सबसे बडी़ बात यह कि कोई किसी से मतलब नहीं रखना चाहता है। महानगर की आपाधापी भरी ज़िंदगी में तो और भी बुरी स्थिति है जहाॅ जीवन मशीनवत चलता जा रहा है और ऐसा जीवन जीने के लिए हर व्यक्ति मजबूर होता जा रहा है लेकिन कवि इस बात को मानता है कि जीवन में कितनी भी मुश्किल हो किंतु मनुश्य को साहस नहीं छोड़ना चाहिए-
‘‘ठंड से नहीें मरते शब्द
वे मर जाते हंै साहस की कमी से
कई बार मौसम की नमी से
मर जाते हैं शब्द’’6
कवि सामाजिक परिवेश को देखते हुए अत्यधिक व्यथित है, उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सारा युगबोध ही अंधकारमय हो गया है -
‘‘काले अक्षर काली रात
कौन करे अब किससे बात
काली जनता काला क्रोध
काला-काला है युगबोध’’7
कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध की तरह केदार का मन भी समाज में फैले असामाजिक तत्वों से बुरी तरह आक्रांत है और ऐसा स्वाभाविक भी है कि कोई भी संवेदनशील कवि बिना प्रतिक्रिया किये हुए नहीं रह सकता है -
‘‘ठायॅ-ठायॅ
बजता रहा मेरे सीने में
अगली सुबह उसी को
एक आदमी के
भव्य ललाट पर चमकते हुए देखा’’8
ऐसी बिगड़ी हुई सामाजिक परिस्थितियों में कवि समस्त काव्य-रचना को व्यर्थ मानता है साथ-साथ उसे सारी मुश्किलों की एक ही जड़ दिखाई पड़ती है और वह है मानवीय संवेदना की कमी। सभी अपने आप में टूटे-बिखरे हुए हैं -
‘‘शब्द सारे धूल हैं, व्याकरण सारे ढ़ोंग
किस तरह खामोश हैं चलते हुए वे लोग
पूछता है एक चेहरा दूसरे से मौन
बचा हो साबूत-ऐसा कहाॅ है वह-कौन?’’
‘‘कह देना पिता से सब ठीक-ठाक है
हवा है,पानी है,
बस्ती के बाहर एक छोटा सा कब्रिस्तान है
सब ठीक-ठाक है’’9
केदारनाथ की कवितायें उनके अन्तर्जगत के परिशीलन की अनुभूतियों से सम्प्रक्त हैं। उनके काव्य में सामान्य वर्ग की हताशा, कुंठा, विजड़न और गत्यावरोधों का अवतरण हुआ है। समकालीन कवियों में ये सर्वाधिक आस्था एवं विश्वास के कवि हैं जो निराशा एवं हताशा में भी आशा एवं विश्वास की उम्मीद नहीं छोड़ते हैं। उन्हें विश्वास है कि जो समय के धागे सुशुप्तावस्था में है उनके उठने का समय हो गया हैै और समाज में जो उपेक्षित एवं दबे-कुचले जन हैं, जिस दिन वे अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े होंगें, उस दिन से दुनियाॅ की कोई ताकत उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर पायेगी।
‘‘उठो मेरे सोये हुए धागों
उठो
उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है
उठेा कि धोबी पहुॅच गया है घाट पर
उठो कि नंग-धड़ग बच्चे
जा रहे हैं स्कूल
उठो मेरी सुबह के धागों
और मेरी शाम के धागों,उठो
झाड़न में
मोजों में
टाट में
दरियों में दबे हुए धागों उठो
कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनियाॅ का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा’’10
साधारण वर्ग को अपने साथ में लेेने की प्रवृत्ति सिंह जी की सबसे बड़ी विशेशता है। बबूल जो कठिन परिस्थितियों में उत्पन्न होता है किन्तु अपनी गरिमा से युक्त जीवन यापन करता है उसी प्रकार साधारण वर्ग भी बड़ी मुश्किलों से जीवन यापन करता है और अपने लिए समाज में जगह बनाता है । समाज के उन लोगों को सामने लाना केदार जी का उद्देश्य है जिन पर शायद ही किसी की नजर जाती हो। किसी भी मनुश्य की चेतना आंतरिक सत्य का ही एक रुप होता है। व्यक्ति की चेतना का सीधा प्रभाव उसकी संवेदना पर पड़ता है । बहुत सी बातें सामाजिक परिवेश से भी साहित्यकार ग्रहण करता है एवं समाज-दर्शन से जीवन बोध प्राप्त करता है। सामाजिक संवेदन की तीव्र अनुभूतियाॅ आज की काव्य-चेतना में विद्यमान हैं। इनकी कविता में सामाजिक गहरे उलझाव, आक्रामक टकराहटों और तनावों का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है और इतनी संवेदनशील कवितायें हैं कि सामाजिक परिवेश के बदलाव की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो उठती है। समाज पर साहित्यकार के संवेदन का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता है और वैसे भी साहित्य से समाज-परिवर्तन की उम्मीद बहुत बड़ी बात होती है किंतु प्रभाव तो पड़ता ही है, चाहें अप्रत्यक्ष रूप से ही सही।
कलाकार या साहित्यकार पाठक को या समाज केा उसकी समकालीन स्थितियों के बारे में सचेत कर देता है। अज्ञेय के शब्दों में, ‘‘वह चिंतन के विकास में उतना नहीं जितना संवेदन के विकास में योगदान दे रहा होता है’’। कवि वर्ग असमानताओं को लेकर अत्यधिक क्षुब्द है।
सामाजिक असमानताओं के ओर कवि संकेत करता हुआ कहता है कि-
‘‘सूरज ‘‘सूरज डूबने के कितनी देर बाद
झॅपने लगती हैें
एक थके हुए आदमी की पलकें
बिस्तर में जाने के कितनी देर बाद
उचट जाती है
एक भरे-पूरे आदमी की नींद’’11
सामान्य से भी कमतर निम्न वर्ग जो कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन-यापन करने के लिए मजबूर है कवि का मन उद्वेलित होता है उनकी जीवन शैली को देखकर और संवेदना उसे कचोटती है इसीलिए उस निम्न वर्ग को कीडे़-मकोड़ों का उपमान देकर कवि व्यंग्य करता है कि कीड़ों का मरना उसे इतना क्यों परेशान कर रहा है-
‘‘ क्या लेबनान में जो कुछ घटित हुआ है
वह रूक जाता ’’?12
सांकेतिक शैली में कवि कीड़ों के मरने से व्यथित नहीं है बल्कि वह उस मनुश्यता केा बचाने के लिए प्रयत्नशील है जो दुनियाॅ की व्यवस्था सुधारने में ही अपना जीवन खत्म करके भी कुछ भी नहीं प्राप्त कर पाते हैं-
‘‘कीड़े तो मरते रहते हैं
हर पल हर क्षण
दुनियाॅ को कुछ और साफ-सुंदर करने को
मर जाते हैं
मरना उनका सुंदरता के हित में है
फिर क्यों होती है पीड़ा’’13
जो वर्ग हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से युक्त है उसे इस बात की कोई परवाह नहीं है कि समाज में कितने लोग ऐसे हैं जो अपनी आवाज उठाने के लिए प्रयत्नशील हैं उनकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए और बाजारीकरण से भी कवि व्यथित है-
‘‘बाजार में धूल थी
न जनता
दोनों को साफ कर दिया गया था’’14
संदर्भ-ग्रंथः-
1. सिंह, केदारनाथ, तालस्ताय और सायकिल, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली,प्रथम स.2005,पृ 67
2. बाजपेई,अशोक,कविता का जनपद,राधाकृश्ण प्रकाशन,प्रथम स.1992,पृ 59
3. वही
4. व्ही
5. सिंह, केदारनाथ, तीसरा सप्तक, स. अज्ञेय, भारतीय ज्ञानपीठ, आठवाॅ सं.2003,पृ.122
6. सिंह, केदारनाथ, अकाल में सारस, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम स.1988 पृ.102
7. वही पृ.95
8. वही पृ.89
9. वही पृ.76
10. सिंह, केदारनाथ, यहाॅ से देखो, राधाकृश्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम स.1983 पृ. 50
11. वही पृ.32
12. वही पृ.32
13. वही पृ.35
14. वही पृ.39
Received on 08.05.2014 Modified on 20.05.2014
Accepted on 12.06.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(2): April. – June. 2014; Page 121-123